advertisement

admit

क्या हम जहरीले बनते जा रहे हैं?


                                                    फोटो स्त्रोत:https://www.superempreendedores.com/
                                                   lifestyle/como-lidar-com-as-frustracoes-profissionais/

आज एक पोस्ट पढ़ा जिसमें यह बताया गया कि एक व्यक्ति किस तरह दूसरे के साथ जहरीला व्यवहार करता है। यहां जहरीला का मतलब बिल्कुल ही अलग है। यानि वह एक स्वार्थी के रूप में आपसे मिलता है काम होते ही आप से दूरी बना लेता है। इससे यह साबित होता है कि वह व्यक्ति जिसने मदद की वह दूसरे के प्रति अपनी भावनाओं को गलत समझ रहा है। और उसे जहरीला करार देता है। यह बात ज्यादातर सोशल मीडिया के फॉलोअर और दोस्ती में ज्यादा महत्व रखती है। इसने व्यक्ति को जोड़ा तो लेकिन एक दूसरे को जहरीला भी बना दिया। आप जब तक लाइक और कमेंट करते हो तब तक व्यक्ति आपका अच्छा फॉलोवर और दोस्त बना रहता है जैसे ही आपने कमेंट और लाइक बंद किया व्यक्ति जहरीला बन जाता है। इसके दोनों पक्षों के अंश नीचे दिए हैं:
स्त्रोत: http://quotesgate.com/toxic-people-never-apologize-for-anything-or-admit-their-mistakes


(जहरीले लोग कभी भी किसी चीज के लिए माफी नहीं मांगते हैं या अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं
हम सभी को जीवन में कुछ विषैले लोगों का सामना करना पड़ा है और हम जानते हैं कि अगर वहाँ एक चीज है जो हम उनसे कभी नहीं लेते हैं तो यह एक ईमानदार माफी है। आप उन्हें इन शब्दों को सुन सकते हैं, लेकिन यह केवल आपका फायदा उठाने के लिए होगा या आपको उन्हें मनचाहा कुछ देने में हेरफेर करेगा। किसी भी अन्य मामले में वे कभी नहीं कहेंगे कि वे क्षमा नहीं करते हैं और न ही स्वीकार करते हैं कि उन्होंने गलती की है। वे हमेशा सही दिखने की कोशिश करेंगे और किसी और पर दोष मढ़ेंगे। क्यों? क्योंकि वे अपनी गलतियों के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं और उन्होंने जो किया है उसकी जिम्मेदारी लेते हैं। ) (इसका हिन्दी रुपांतर गूगल बाबा की सहयोग से किया है।)


क्या व्यक्ति वास्तव में ऐसा होता है। इसके जवाब में एक दूसरी पोस्ट पढ़ने को मिली जिसका कुछ अंश इस प्रकार है:
मानव व्यवहार का बहुत महत्वपूर्ण नियम है। अगर हम उस नियम का पालन करेंगे तो कभी मुश्किल में नहीं फँसेंगे। उस नियम पर चलेंगे तो हमारे पास अनगिनत दोस्त होंगे और हम हमेशा खुश रहेंगे। परंतु जिस पल हम उस नियम को तोड़ेंगे, उसी पल से मुश्किलों में फँस जाएँगे। बुद्ध ने ईसा के पाँच सौ साल पहले पवित्र गंगा नदी के किनारे पर इसका पाठ पढ़ाया था! 1900 साल पहले हिन्दू धार्मिक ग्रंथों ने इस सूत्र की व्याख्या की थी। ईसा मसीह ने इस सूत्र को एक विचार के रूप में संक्षेप में कहा था, जो शायद दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण नियम है, ‘दूसरों के साथ वही व्यवहार करो, जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें।’ आप चाहते हैं कि आपसे मिलने-जुलने वाले लोग आपकी तारीफ करें, आप चाहते हैं कि आपकी प्रतिभा को पहचाना जाए, आप चाहते हैं कि आप अपनी छोटी-सी दुनिया में महत्वपूर्ण बनें, आप सस्ती चापलूसी या झूठी तारीफ नहीं सुनना चाहते, परंतु आप सच्ची प्रशंसा अवश्य सुनना चाहते हैं। आप चाहते हैं कि आपके मित्र और सहयोगी आपकी दिल खोलकर तारीफ करें और मुक्तकंठ से सराहना करें! हम सभी यह चाहते हैं। इसलिए हमें इस स्वर्णिम नियम का पालन करना चाहिए और दूसरों को वही देना चाहिए, जो हम उनसे अपने लिए चाहते हैं। कब? कैसे? कहाँ? जवाब है- हर समय, हर कहीं। कई लोगों की जिंदगी शायद बदल जाए अगर कोई उन्हें यह अनुभव करा दे कि वे महत्वपूर्ण हैं। बिना लाग-लपेट के सच बात यह है कि आपसे मिलने वाले ज्यादातर लोग अपने आपको आपसे किसी न किसी मामले में सुपीरियर समझते हैं। स्त्रोत: वेबदुनिया

मेरा तो यह मानना है कि ऊपर के अंश से यह तो पता चल ही जाता है कि प्रत्येक प्राणी अपनी प्रशंसा का भूख है। अगर उसे समुचित प्रशंसा नहीं मिलती है तो वह सामने वाले को जहरीला करार देता है। यानि जब तक आप अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं वह आपके िलए महत्वपूर्ण व्यक्ति है। जैसे ही उसने आपकी प्रशंसा बंद की या अपनी कोई कार्य के लिए आपसे अनुरोध किया आपके लिए वह व्यक्ति कटुता पूर्ण हो गया। इसलिए सिर्फ प्रशंसा पाना ही सही नहीं है एक बार आप भी सामने वाले की प्रशंसा करके उसके अनुग्रहित करें ताकि आपकी प्रशंसा वाली बातें कम न हों।

About akhil

0 comments:

Powered by Blogger.